BJP मंडल अध्यक्ष पर शिकायत पलटी,गुमिया में फर्जी हस्ताक्षर का बवाल, सरपंच बोले– “साजिश के तहत हमें बदनाम किया जा रहा”
गोचर भूमि विवाद से उठी सियासी चिंगारी, अब फर्जी शिकायत, अवैध वसूली और दबाव की आशंका ने बढ़ाया मामला

कोरबा। जिले के गुमिया गांव में भाजपा मंडल अध्यक्ष ओमप्रकाश साहू के खिलाफ की गई शिकायत ने अब पूरी तरह से नया और विस्फोटक मोड़ ले लिया है। जिस आवेदन के आधार पर गोचर भूमि पर अवैध कब्जे का आरोप लगाया गया था, उसी पर अब सरपंच ने बड़ा पलटवार करते हुए इसे फर्जी करार दिया है। सरपंच गौतम प्रसाद बियार का साफ कहना है कि उनके नाम और सील का दुरुपयोग कर यह शिकायत रची गई—और इसका मकसद केवल राजनीतिक बदनामी है।
सरपंच के इस बयान के बाद मामला सिर्फ जमीन विवाद तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि इसमें साजिश, फर्जीवाड़ा और अवैध वसूली जैसे गंभीर आरोप जुड़ गए हैं।

फर्जी हस्ताक्षर से शिकायत! सरपंच का सनसनीखेज दावा
सरपंच गौतम प्रसाद बियार ने साफ शब्दों में कहा है कि 2 मार्च 2026 को जो शिकायत जनदर्शन में दी गई, उसमें उनका कोई हाथ नहीं है। उनका आरोप है कि उनकी अनुपस्थिति में किसी अज्ञात व्यक्ति ने उनके हस्ताक्षर और पंचायत की सील का गलत इस्तेमाल कर आवेदन पेश कर दिया।

उन्होंने इसे पूरी तरह “फर्जी और आधारहीन” बताते हुए कहा कि यह सब एक सुनियोजित साजिश के तहत किया गया है, ताकि उन्हें और भाजपा मंडल अध्यक्ष ओमप्रकाश साहू को राजनीतिक रूप से बदनाम किया जा सके।
कब्जे पर नया तर्क: “30 साल पुराना मामला, अवैध नहीं”

सरपंच ने विवादित भूमि को लेकर भी नया पक्ष रखा है। उनका कहना है कि जिस खसरा नंबर 1318/1 की गोचर भूमि पर कब्जे का आरोप लगाया जा रहा है, वह जमीन पहले से ही उनके रिश्तेदार फिरतराम बियार के कब्जे में थी, जो करीब 30-35 वर्षों से वहां काबिज थे।
बताया गया कि लगभग 15 साल पहले उन्होंने ही यह जमीन ओमप्रकाश साहू को सौंप दी थी, और तब से साहू उस पर खेती कर रहे हैं। सरपंच का दावा है कि यह कोई नया या अवैध कब्जा नहीं है, बल्कि पुरानी स्थिति ही बनी हुई है।
अब वसूली का आरोप: “हमारे नाम पर चल रहा उगाही का खेल”
मामले ने और गंभीर रूप तब लिया जब सरपंच ने गांव में अवैध वसूली का मुद्दा उठाया। उनका आरोप है कि कुछ अज्ञात लोग गांव से गुजरने वाले भारी वाहनों को रोककर उनके और मंडल अध्यक्ष के नाम पर पैसे वसूल रहे हैं।
उन्होंने कहा कि यह न सिर्फ अवैध है, बल्कि उनकी छवि खराब करने की साजिश भी है। इस पूरे नेटवर्क की जांच की मांग करते हुए उन्होंने गांव में भारी वाहनों के प्रवेश पर रोक लगाने की भी बात कही है।
जांच से पहले शिकायत वापसी क्यों? उठे बड़े सवाल
इस पूरे घटनाक्रम ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं—
शिकायत पत्र में अन्य लोगों के हस्ताक्षर भी हैं, तो क्या सबके सामने सरपंच के फर्जी हस्ताक्षर लगाए गए?
यदि जमीन पहले से कब्जे में थी, तो उसे आगे सौंपना वैध कैसे माना जा सकता है?
अवैध वसूली की बात अचानक अब क्यों सामने आई?
क्या सरपंच किसी राजनीतिक दबाव में आकर बयान बदल रहे हैं?
2 मार्च को की गई शिकायत 14 दिन बाद वापस क्यों ली गई, वो भी तब जब कलेक्टर ने जांच के आदेश दे दिए थे?
मामला गरमाया, जांच पर टिकी निगाहें
इस पूरे मामले में अब प्रशासन की भूमिका बेहद अहम हो गई है। फर्जी हस्ताक्षर, जमीन कब्जा और अवैध वसूली जैसे आरोपों के बीच सच्चाई क्या है, यह जांच के बाद ही साफ हो पाएगा।
फिलहाल गुमिया गांव का यह विवाद राजनीतिक रंग ले चुका है और हर किसी की नजर अब प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हुई है।









